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"जीआई टैग: लोकल प्रोडक्ट, ग्लोबल पहचान"

Learn GI Tags in India, Bihar's 16 GI products, benefits, registration process, latest updates and BPSC exam relevance.

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Written by Akhilesh Anand
Published: 7 August 202612 min read
"जीआई टैग: लोकल प्रोडक्ट, ग्लोबल पहचान"
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"जीआई टैग: लोकल प्रोडक्ट, ग्लोबल पहचान"

चर्चा में क्यों है?

हाल ही में प्रेस सूचना ब्यूरो यानी (पीआईबी) ने ‘जीआई टैग: वैश्विक ब्रांडों में पारंपरिक संपदा की वृद्धि’ शीर्षक के साथ एक सारगर्भित लेख जारी किया है। इस लेख में बताया गया है कि भौगोलिक संकेतक यानी GI टैग सिर्फ एक मुहर नहीं है, बल्कि यह हमारे गांवों के कारीगरों के लिए नए आर्थिक अवसर खोलता है, हमारी सदियों पुरानी संस्कृति और पारंपरिक ज्ञान को बचाता है। कुलमिलाकर पीआईबी के इस लेख में कहा गया है कि GI टैग अब सिर्फ कागज का सर्टिफिकेट नहीं, बल्कि भारत की परंपरा को ग्लोबल ब्रांड बनाने का टूल बन चुका है। आज के इस ब्लॉग में भारत में भौगोलिक संकेतक (जीआई टैग) की शुरूआत और इसकी सफलता की कहानियों के अलावा इसके समक्ष मौजूद चुनौतियों का समझने का प्रयास करेंगे।

भौगोलिक संकेत (GI) टैग क्या है?

GI यानी Geographical Indication (भौगोलिक संकेत) एक तरह का "पहचान पत्र" है। ये किसी उत्पाद को उसके खास इलाके के नाम से जोड़ देता है। इसका मतलब है कि उस उत्पाद में वो खासियत, स्वाद या क्वालिटी सिर्फ उसी जगह की मिट्टी, पानी, मौसम और वहां के लोगों के हुनर की वजह से आती है।

भौगोलिक संकेतक मिल जाने के बाद अब कोई भी नकली "कश्मीरी केसर" या "दार्जिलिंग चाय" के नाम पर अन्य उत्पादों को नहीं बेच सकता है। सिर्फ उसी क्षेत्र के अधिकृत लोग ही इस नाम का इस्तेमाल कर सकते हैं। GI टैग मिलने के बाद उत्पाद की कीमत 20-30% तक बढ़ जाती है।

जीआई टैग का महत्व

इससे सीधा फायदा उस गांव के कारीगर और किसान को होता है। सीधे शब्दों में कहें तो GI टैग से दो फायदे होते हैं - गाँव वालों को रोजगार मिलता है, और भारत की संस्कृति व पारंपरिक शिल्प को एक नई पहचान और सुरक्षा मिलती है।

ये टैग हमारी पुरानी कला, हुनर और पारंपरिक ज्ञान को जिंदा रखता है। आने वाली पीढ़ियां भी जान पाती हैं कि "हमारा ये शिल्प कितना खास है"। यानी GI टैग सिर्फ एक कानून नहीं है। ये हमारे गांव, हमारी मिट्टी और हमारे हुनर की कहानी है, जिसे अब दुनिया भी जान रही है।

जीआई टैग की शुरुआत कहाँ से हुई?

भारत में जीआई टैग की कहानी शुरू हुई दार्जिलिंग चाय से। जी हाँ, पहाड़ों की वो खुशबू वाली चाय ही भारत का पहला उत्पाद था जिसे GI का दर्जा मिला। खास बात ये थी कि यहाँ सिर्फ नाम ही नहीं, बल्कि दार्जिलिंग चाय के लोगो को भी कानूनी सुरक्षा दी गई। इसके बाद धीरे-धीरे और उत्पाद लाइन में लगे। जैसे केरल का अरनमुला कन्नडी - यानी वो चमकता हुआ धातु का शीशा जो मंदिरों में इस्तेमाल होता है, और तेलंगाना की पोचमपल्ली इकत - रंग-बिरंगे धागों से बुनी वो साड़ी जिसकी पहचान पूरी दुनिया में है।

भारत की सफलता

भारत 800 से अधिक पंजीकृत जीआई उत्पादों का घर है और 2014 से 607 जीआई प्रदान किए गए हैं। पिछले 10 वर्षों में, जीआई टैग के लिए अधिकृत उपयोगकर्ता 365 से बढ़कर 29,000 (जनवरी 2025 तक) हो गए। भारतीय जीआई उत्पादों के लिए प्रमुख निर्यात स्थलों में ब्रिटेन, इटली, यूएई, बहरीन, कतर, अमेरिका, दक्षिण कोरिया शामिल हैं।

वैधानिक दर्जा क्या है?

बौद्धिक संपदा के एक रूप के रूप में, जीआई को औद्योगिक संपदा के संरक्षण के लिए पेरिस कन्वेंशन और बौद्धिक संपदा अधिकारों के व्यापार से संबंधित पहलुओं पर विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) के समझौते (ट्रिप्स) के तहत अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त है।

भारत में, उनके पंजीकरण और संरक्षण की देखरेख 1999 अधिनियम के तहत भौगोलिक संकेत रजिस्ट्री द्वारा की जाती है। इसका मतलब सीधा है - एक बार टैग मिल गया तो सिर्फ उसी क्षेत्र के लोग ही उस नाम का इस्तेमाल कर सकते हैं। नकल पर रोक लग जाती है।

भारत ने वस्तुओं का भौगोलिक संकेत (पंजीकरण और संरक्षण) अधिनियम, 1999 और 2002 में अधिसूचित संबद्ध नियमावली के माध्यम से विशिष्ट क्षेत्रों से जुड़े उत्पादों की सुरक्षा के लिए एक कानूनी ढांचा स्थापित किया है। यह ढांचा 2003 में चालू हो गया और जीआई पंजीकरण 2004-05 में शुरू हुआ। वस्तुओं के भौगोलिक संकेत (पंजीकरण और संरक्षण) नियमावली, 2002 को 2025 में संशोधित किया गया था।

2025 में संशोधन

2025 संशोधन के माध्यम से, जीआई आवेदन दाखिल करने और संबंधित प्रक्रियाओं के लिए शुल्क में 80 प्रतिशत की कमी की गई है। टैग के लिए नवीनीकरण शुल्क भी 3,000 रुपये से घटाकर केवल 500 रुपये कर दिया गया है! पिछले 10 वर्षों में, जीआई टैग के लिए अधिकृत उपयोगकर्ता 365 से बढ़कर 29,000 (जनवरी 2025 तक) हो गए।

जीआई टैग: पंजीकरण, सुरक्षा और नवीनीकरण

जीआई टैग पाना इतना आसान नहीं है। इसके लिए कुछ कानूनी शर्तें पूरी करनी होती हैं। भारत में तय है कि कौन आवेदन कर सकता है, टैग कितने साल तक चलेगा, और किन वजहों से इसे रद्द किया जा सकता है।

कौन आवेदन कर सकता है?:-कोई भी किसान समूह, कारीगर संघ, उत्पादक संगठन या सरकारी प्राधिकरण GI के लिए आवेदन कर सकता है। शर्त बस ये है कि आवेदक को उस क्षेत्र के असली उत्पादकों का प्रतिनिधित्व करना होगा। अगर आप संघ नहीं हैं, तो आपको ये साबित करना पड़ेगा कि आप वाकई उत्पादकों के हित में काम कर रहे हैं।

आवेदन कैसे करें?:-आवेदन सीधे चेन्नई में स्थित जीआई रजिस्ट्री में जमा किया जा सकता है। रजिस्ट्री का दायरा पूरे भारत में है। आप फॉर्म डाक, स्पीड पोस्ट या कूरियर से भी भेज सकते हैं।

जीआई टैग की वैधता कितनी है?

एक बार मिला जीआई टैग 10 साल के लिए वैध होता है। लेकिन हर 10 साल बाद इसे आसानी से रिन्यू कराया जा सकता है, ताकि पहचान बनी रहे।क्या जीआई टैग रद्द भी हो सकता है?

अधिनियम की धारा 27 के तहत अगर कोई व्यक्ति ये साबित कर दे कि टैग का गलत इस्तेमाल हो रहा है या जानकारी गलत थी, तो वो रजिस्ट्रार के पास आवेदन करके इसे रद्द या बदलवा सकता है।

जरूरत पड़ने पर रजिस्ट्रार या अपीलीय बोर्ड खुद भी ये कार्रवाई शुरू कर सकते हैं। सीधे शब्दों में - जीआई टैग स्थायी नहीं है। इसकी निगरानी होती रहती है।

जीआई टैग में अग्रणी राज्य

भारत के कई राज्य अपनी जीआई विरासत को आगे बढ़ाने में जुटे हैं। दिसंबर 2025 तक के आंकड़ों के मुताबिक, उत्तर प्रदेश 81 जीआई-टैग उत्पादों के साथ सबसे आगे है। इसके बाद तमिलनाडु 76 उत्पादों के साथ और महाराष्ट्र 55 उत्पादों के साथ आता है। यानी हर राज्य अपनी मिट्टी की खास पहचान को दुनिया के सामने लाने की होड़ में है।

हर कैटेगरी में जीआई-टैग वाले उत्पाद

भारत सच में जीआई उत्पादों का खजाना है। दिसंबर 2025 तक हमारे पास हस्तशिल्प से लेकर खाने-पीने की चीजों तक, हर कैटेगरी में जीआई-टैग वाले उत्पाद हैं।

हस्तशिल्प - 445 उत्पाद + 27 लोगोकारीगरों की मेहनत की पहचान। जैसे कश्मीर की पश्मीना, बंगाल की बालूचरी साड़ी और बनारस की गुलाबी मीनाकारी।

कृषि उत्पाद - 251 उत्पादखेत की उपज को मिली खास पहचान। इसमें अनाज, फल, सब्जी, मसाले और गैर-बासमती चावल शामिल हैं।

विनिर्माण उत्पाद - 64 उत्पादफैक्ट्री से निकली खास चीजें। जैसे नासिक वैली वाइन और कन्नौज का इत्र।

खाद्य उत्पाद - 66 उत्पादस्वाद में भी जीआई की मोहर। जैसे बंगाल का मिहिदाना-सीताभोग, ओडिशा की केंद्रपाड़ा रसाबली और तिरुपति का प्रसिद्ध लड्डू।

प्राकृतिक उत्पाद - 5 उत्पादमिट्टी और पत्थर की पहचान। जैसे राजस्थान का मकराना मार्बल, यूपी का चुनार बलुआ पत्थर और MP का पन्ना हीरा।

जीआई टैग को मजबूत करने के लिए सरकार की योजनाएं

सरकार अब सिर्फ टैग देकर नहीं रुक रही। उसे बेचने, पहचान दिलाने और कानूनी सुरक्षा देने पर भी काम हो रहा है। "आत्मनिर्भर भारत" और "वोकल फॉर लोकल" की सोच के साथ ये पहल कारीगरों, किसानों और उत्पादक समुदायों को सीधे फायदा पहुंचा रही हैं।

पीएम एकता मॉल / यूनिटी मॉल - हर राज्य में बन रहे ये मॉल "एक जिला एक उत्पाद", जीआई-टैग और हस्तशिल्प को बेचने का बड़ा हब हैं। FY 2023-24 में सभी राज्यों में मॉल बनाने के लिए 5000 करोड़ रुपये का बजट दिया गया। मकसद साफ है - लोकल प्रोडक्ट को बड़ी मार्केट मिले।

वन स्टेशन वन प्रोडक्ट – OSOP रेलवे स्टेशनों पर जीआई बूथ लगाए गए हैं। यहाँ जीआई उत्पाद, हथकरघा, हस्तशिल्प और खाने की चीजें सीधे बिकती हैं।इससे कारीगरों, बुनकरों और किसानों को बिचौलिए हटाकर सीधे ग्राहक तक पहुंच मिल रही है।

जीआई ट्रेल - पर्यटन + खरीदारी:-अब जीआई गांवों को टूरिज्म से जोड़ा जा रहा है। फ्रांस के वाइन टूर की तरह भारत में भी पोचमपल्ली इकत गांव और दार्जिलिंग चाय बागान ट्रेल शुरू हुए हैं। जून 2026 में असम में मुगा सिल्क ट्रेल और सिल्क टूरिज्म पार्क की घोषणा हुई। इससे असम रेशम विरासत का बड़ा केंद्र बनेगा।

एमएसएमई अभिनव योजना - IPR सपोर्ट:-MSME को जीआई रजिस्ट्रेशन की पूरी लागत वापस मिलती है। सीमा है 2 लाख रुपये प्रति जीआई। यानी छोटा कारीगर भी बिना खर्च के रजिस्ट्रेशन करा सकता है।

वित्तीय सहायता:- वस्त्र मंत्रालय जीआई के कानूनी खर्च के लिए 1.5 लाख रुपये तक देता है। NHDP के तहत 104 जीआई हथकरघा उत्पादों और 53 रजिस्ट्रेशन को जून 2026 तक मदद मिली।

APEDA का निर्यात अभियान:- APEDA जीआई कृषि उत्पादों को दुनिया तक पहुंचा रहा है। 2026 में ताजे फल, चावल और प्रोसेस्ड फूड की पहली शिपमेंट से किसानों की कमाई बढ़ी और "भारत का स्वाद" ग्लोबल हुआ।

EU-भारत FTA कनेक्शन:-FTA से जीआई उत्पादों को नई मार्केट मिल रही है। दिसंबर 2025 में कर्नाटक का इंडी लाइम पहली बार ओमान गया। न्यूजीलैंड ने भारतीय जीआई को सुरक्षा देने की हामी भरी।  भारत-EU FTA में अलग से जीआई समझौते पर बात चल रही है।

भारत में GI टैग से जुड़ी चिंताएं

GI टैग अच्छा है, पर इसे लागू करने में कई दिक्कतें अब भी हैं:

कानून और प्रक्रिया पुरानी है:- GI एक्ट 1999 का है। 20 साल बाद भी उसमें बदलाव नहीं हुए। फॉर्म जटिल हैं, मंजूरी में टाइम लगता है और स्वीकृति रेट सिर्फ 46% है। इसके बाद भी उत्पादकों को सही गाइडेंस नहीं मिलती।

"उत्पादक" की परिभाषा साफ नहीं:-कानून में "उत्पादक" कौन है, ये स्पष्ट नहीं है। नतीजा - बीच के बिचौलिए फायदा ले जाते हैं और असली कारीगर-किसान पीछे रह जाते हैं। अंतर्राष्ट्रीय लड़ाईदार्जिलिंग चाय और बासमती जैसे केस दिखाते हैं कि GI को पेटेंट-ट्रेडमार्क जितनी अहमियत नहीं मिली। विदेशों में लड़ाई लड़ना मुश्किल हो जाता है।

जीआई उत्पादों को बढ़ावा देने के कार्यक्रम

मेले और समिट: शिल्प मेले, दिल्ली हाट, "जीआई एंड बियॉन्ड: विरासत से विकास तक" जैसे इवेंट। यहाँ बुनकरों-कलाकारों के लिए वर्कशॉप और सेमिनार भी होते हैं।

बड़े मंचों पर जीआई: वर्ल्ड फूड इंडिया 2025, ट्राइबल बिजनेस कॉन्क्लेव 2025, इंडिया AI इम्पैक्ट समिट 2026 में जीआई उत्पादों को खास जगह मिली। वाराणसी, दिल्ली-मुंबई एयरपोर्ट और दिल्ली मेट्रो की स्क्रीन पर भी जीआई को प्रमोट किया जा रहा है।

ग्लोबल शोकेस: भारत के जीआई उत्पाद अब विदेशों में भी दिखते हैं। जैसे UK का ऑटम फेयर 2024 और जर्मनी का बाजार बर्लिन 2024।

निष्कर्ष

भारत का जीआई इकोसिस्टम अब सिर्फ पहचान नहीं, बल्कि परंपरा और मौके के बीच एक पुल बन गया है। जीआई टैग विरासत को बचाने के साथ-साथ कारीगरों, किसानों और बुनकरों को सीधे आर्थिक मजबूती दे रहा है। इससे लोकल उत्पादों को घरेलू और दुनिया भर के बाजारों में नई पहचान और जगह मिल रही है। सरकार ने वर्ष 2030 तक 10,000 जीआई पंजीकरण कराने का लक्ष्य भी निर्धारित किया है। इस लक्ष्य के साथ भारत अपनी "विरासत अर्थव्यवस्था" को मजबूत करने और अपने प्रोडक्ट्स को ग्लोबल लेवल पर चमकाने के लिए पूरी तरह तैयार है।

जीआई टैग बिहार लोक सेवा आयोग (BPSC) के पाठ्यक्रम में मुख्य रूप से अर्थव्यवस्था और भूगोल के अंतर्गत आता है। यह विषय BPSC की प्रारंभिक (Prelims) और मुख्य (Mains) दोनों परीक्षाओं का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

Reference:

  1. https://www.pib.gov.in/PressReleasePage.aspx?PRID=2294127&reg=48&lang=2
What is a GI (Geographical Indication) tag?

A GI tag is an identity certification that links a product to a specific region, showing that its unique quality, taste, or characteristics come from that area's soil, water, climate, and local skill.

What was India's first GI-tagged product?

Darjeeling Tea was India's first product to receive GI status, and its logo was also given legal protection.

How much can a GI tag increase a product's price?

According to the article, a product's price can increase by 20 to 30 percent after it receives a GI tag.

How many GI products does India currently have?

India is home to more than 800 registered GI products, with 607 GIs granted since 2014, and authorized users grew from 365 to 29,000 by January 2025.

How long is a GI tag valid?

A GI tag is valid for 10 years and can be renewed every 10 years to keep the recognition active.

Which state leads India in GI-tagged products?

As of December 2025, Uttar Pradesh leads with 81 GI-tagged products, followed by Tamil Nadu with 76 and Maharashtra with 55.

What changed in the 2025 amendment to GI rules?

The 2025 amendment reduced fees for filing GI applications by 80% and cut the renewal fee from 3,000 rupees to just 500 rupees.

Can a GI tag be cancelled?

Yes, under Section 27 of the Act, if someone proves that a tag is being misused or was granted based on incorrect information, they can apply to the Registrar to have it cancelled or changed.

What is the MSME Innovative Scheme for GI registration?

Under this scheme, MSMEs get the full cost of GI registration reimbursed, up to a cap of 2 lakh rupees per GI, effectively making registration free for small artisans.

Is the GI tag topic relevant to BPSC?

Yes, GI tags fall mainly under Economy and Geography in the BPSC syllabus and are an important topic for both the Prelims and Mains examinations.

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