नई तकनीक से अल्जाइमर की जल्द पहचान
खबरों में क्यों है?
हाल ही में JNCASR, बेंगलुरु के वैज्ञानिकों ने अल्जाइमर के शुरुआती बायोमार्कर Amyloid-β (Aβ) को पकड़ने के लिए एक नया स्मार्ट अणु TZ-48 और स्मार्टफोन-आधारित प्लेटफॉर्म ADxFluor विकसित किया है। यह रिसर्च प्रतिष्ठित जर्नल ACS Chemical Neuroscience में प्रकाशित हुई है।
खास बात यह है कि यह महंगे PET/MRI की जगह सिर्फ स्मार्टफोन से खून के सीरम में Aβ लेवल को कुछ मिनट में सस्ते और सटीक तरीके से माप देता है। यह भारत में बनी कम लागत वाली पॉइंट-ऑफ-केयर तकनीक है, जो अल्जाइमर की अर्ली स्क्रीनिंग में गेमचेंजर साबित हो सकती है।
अल्जाइमर क्या है ?
अल्जाइमर एक प्रगतिशील न्यूरोडिजेनेरेटिव बीमारी है जिसमें याददाश्त, सोचने-समझने की क्षमता धीरे-धीरे खत्म होने लगती है। इसके पीछे मुख्य कारण है दिमाग में एमिलॉयड-बीटा (Aβ) प्रोटीन का गलत तरीके से मुड़ना और प्लाक के रूप में जमा होना। यह प्लाक न्यूरॉन्स को नुकसान पहुंचाता है। दिक्कत ये है कि जब तक लक्षण दिखते हैं, तब तक 15-20 साल पहले से ही Aβ जमा होना शुरू हो चुका होता है।
अभी तक जांच क्यों मुश्किल थी?
NIA-AA फ्रेमवर्क के अनुसार Aβ सबसे शुरुआती और भरोसेमंद बायोमार्कर है। लेकिन PET और MRI जैसी जांचें महंगी हैं, हर जिले में नहीं हैं और एक्सपर्ट चाहिए। ब्लड-बेस्ड टेस्ट आए हैं पर वो भी कॉस्टली और टेक्निकल हैं। हमें एक सस्ता, आसान और गांव-गांव तक पहुंचने वाला टेस्ट चाहिए था।
नई तकनीक क्या है?
JNCASR, बेंगलुरु के वैज्ञानिकों ने इसी गैप को भरने के लिए दो चीजें बनाई हैं।
a) TZ-48 - एक स्मार्ट प्रोब: यह एक फ्लोरेसेंस-रिस्पॉन्सिव छोटा अणु है। Aβ फाइब्रिल्स के संपर्क में आते ही यह टर्न-ऑन हो जाता है यानी इसकी चमक और लाइफटाइम बदल जाती है। यह ब्लड-ब्रेन बैरियर पार कर सकता है और चूहों के दिमाग में Aβ प्लाक को सटीकता से लेबल करता है।
b) ADxFluor - स्मार्टफोन प्लेटफॉर्म: वैज्ञानिकों कृति भगवत, मधु रमेश और प्रो. थिम्मैया गोविंदराजू की टीम ने TZ-48 को स्मार्टफोन से जोड़ दिया। ब्लड सीरम में TZ-48 डालो, उसकी फ्लोरेसेंस को फोन का ऐप रिकॉर्ड कर लेता है और कुछ मिनट में Aβ लेवल बता देता है।
यह तकनीक खास क्यों है?
डुअल मोड: एक ही प्रोब से ब्रेन इमेजिंग (CLSM और FLIM के जरिए) और बायोफ्लुइड यानी CSF और सीरम में डिटेक्शन दोनों हो सकते हैं।
लाइफटाइम-आधारित: FLIM तकनीक जांच की मात्रा और फोटोब्लिचिंग से प्रभावित नहीं होती, इसलिए रिजल्ट ज्यादा भरोसेमंद है।
पोर्टेबल और सस्ता: बड़ी मशीन नहीं, सिर्फ स्मार्टफोन और प्रोब। इससे पॉइंट-ऑफ-केयर टेस्ट संभव है, जो PHC लेवल पर भी हो सकता है।
अभी यह टेस्ट ट्रांसजेनिक चूहों पर सफल रहा है। इंसानों के ब्लड सैंपल पर बड़े क्लिनिकल ट्रायल, रेगुलेटरी अप्रूवल और डेटा सिक्योरिटी बाकी है। साथ ही Aβ के अलावा Tau और न्यूरोडीजेनेरेशन मार्कर्स को भी जोड़ना होगा।
भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है?
भारत में बुजुर्ग आबादी तेजी से बढ़ रही है और डिमेंशिया के केस बढ़ेंगे। ऐसी कम लागत वाली स्वदेशी तकनीक आयुष्मान भारत और डिजिटल हेल्थ मिशन के तहत शुरुआती स्क्रीनिंग को संभव बनाएगी। यह 'मेक इन इंडिया' डायग्नोस्टिक्स का बेहतरीन उदाहरण है जो ACS Chemical Neuroscience में प्रकाशित हुआ है।
अल्जाइमर रोग के लक्षण क्या है?
अल्जाइमर एक प्रगतिशील दिमागी बीमारी है जो धीरे-धीरे याददाश्त, सोचने-समझने और रोजमर्रा के कामों को खत्म कर देती है। यह डिमेंशिया का सबसे आम कारण है, डिमेंशिया के 60-80% केस इसी की वजह से होते हैं।
शुरुआत में चीजें भूलना, शब्दों को भूल जाना, निर्णय लेने में दिक्कत, समय और जगह को लेकर कन्फ्यूजन, और मूड या व्यक्तित्व में बदलाव। धीरे-धीरे मरीज अपने परिवार को भी पहचानना बंद कर देता है।
कारण क्या है?
इसका एक कारण नहीं है, कई फैक्टर मिलकर काम करते हैं:
| उम्र: | 65 साल के बाद खतरा सबसे ज्यादा। |
| जेनेटिक्स: | APP, PSEN1, PSEN2 जैसे जीन में गड़बड़ी। |
| प्रोटीन का जमाव: | दिमाग में एमिलॉयड-बीटा प्रोटीन बाहर प्लाक बनाता है और टाऊ प्रोटीन अंदर गुच्छे बनाता है। यही न्यूरॉन्स को मारता है। |
| लाइफस्टाइल: | दिल की बीमारी, डायबिटीज, मोटापा, धूम्रपान और सुस्त जीवनशैली से रिस्क बढ़ता है। |
जांच कैसे होती है?
डॉक्टर मेमोरी टेस्ट, MRI/PET स्कैन और CSF या एमिलॉयड PET जैसे बायोमार्कर टेस्ट से पहचान करते हैं।
फिलहाल इसका कोई स्थायी इलाज नहीं है। दवाएं सिर्फ लक्षणों को कुछ समय के लिए धीमा कर सकती हैं।
दुनिया में 5.5 करोड़ से ज्यादा लोग इससे पीड़ित हैं। भारत में बुजुर्ग आबादी बढ़ने से 2030 तक डिमेंशिया के मरीजों की संख्या 76 लाख तक पहुंचने का अनुमान है, इसलिए शुरुआती जांच बहुत जरूरी है।
निष्कर्ष
अल्जाइमर का कोई स्थायी इलाज भले ही आज न हो, पर उसकी शुरुआती पहचान ही सबसे बड़ा इलाज है। JNCASR की TZ-48 और ADxFluor जैसी तकनीक इसी दिशा में उम्मीद जगाती है। महंगे PET/MRI की जगह सिर्फ एक स्मार्टफोन से खून की जांच, वह भी सस्ते में और PHC स्तर पर - यह भारत जैसे देश के लिए गेमचेंजर है। अगर यह तकनीक क्लिनिकल ट्रायल में सफल होती है, तो हम बीमारी को लक्षण आने से 15-20 साल पहले ही पकड़ पाएंगे, मरीज और परिवार को तैयारी का समय मिलेगा। अल्जाइमर सिर्फ याददाश्त जाने की बीमारी नहीं, बल्कि पूरे परिवार और समाज पर असर डालने वाली चुनौती है। स्वस्थ जीवनशैली, समय पर स्क्रीनिंग और ऐसी स्वदेशी सस्ती तकनीक ही इसका सबसे बेहतर जवाब है।






